‘रिवेंज एक ऐसी डिश है, जिसे जितना ठंडा करके खाया जाए वो टेस्ट में उतना अच्छा लगता है’… पता नहीं विशाल उर्फ विक्की ने फिल्म ‘गॉड फादर’ देखी है या नहीं, लेकिन उसके बदला लेने का तरीका तो कुछ-कुछ फिल्म के डायलॉग जैसा ही है. वाराणसी के राजेंद्र गुप्ता परिवार के सामूहिक हत्याकांड की कहानी 28 साल पहले तारीख 5 नवंबर, दिन मंगलवार और साल 1997 को शुरू होती है, जब संपत्ति विवाद में राजेंद्र गुप्ता ने अपने छोटे भाई कृष्णा और उसकी पत्नी की हत्या कर दी थी.
भदैनी के उस गली के रहने वाले बताते हैं कि राजेंद्र गुप्ता ने छोटे भाई के पूरे परिवार को ही खत्म करने का मन बना लिया था. पति-पत्नी की हत्या के बाद हत्यारे बच्चों को भी ढूंढ़ रहे थे, लेकिन पांच साल की डॉली अपने ढाई साल के भाई विशाल उर्फ विक्की और छह महीने के प्रशांत उर्फ जुगनू को लेकर अलमारी के पीछे छिप गई और लोगों के हंगामा करने के कारण हत्यारे और राजेंद्र वहां से फरार हो गए. उस दौरान हुई गोलीबारी में कुछ छर्रे विक्की के हाथ में भी लगे थे.
कुछ दिनों के बाद राजेंद्र की गिरफ्तारी हुई और वो जेल चला गया. हत्या और जेल जाने के कारण पहली पत्नी उसको छोड़कर अपना बेटा लेकर हमेशा के लिए बंगाल के आसनसोल चली गई. जेल से पैरोल पर छूटने के बाद संपत्ति का विवाद पीछा नहीं छोड़ा और राजेंद्र ने अपने पिता लक्ष्मी नारायण और उनके अंगरक्षक की भी हत्या कर दी. एक के बाद एक हुई चार हत्याओं के बाद भी दो साल के अंदर वो फिर से पैरोल पर छूटकर आया और अपने ही एक किरायेदार की बेटी से प्रेम विवाह किया. ब्राह्मण परिवार की नीतू ने राजेंद्र से शादी कर ली. नीतू के परिवार वालों ने उससे संबंध तोड़ लिया और हमेशा के लिए वो जगह छोड़ दी.
कुछ सालों के बाद गवाहों के टूट जाने, मुख्य गवाह मां शारदा देवी के मुकर जाने और साक्ष्य के अभाव में राजेंद्र गुप्ता बरी हो गया. बरी होने के बाद उसके जीवन में कुछ ठहराव आया. पुश्तैनी जमीन और किराये पर कमरा देने के व्यवसाय के साथ देसी शराब की दो दुकानें भी उसने अपने प्लॉट पर खुलने दी, जिससे उसको अच्छा खासा किराया आने लगा. इसी दौरान उसके दो बेटे नवनेंद्र, शुबेंद्र और एक बेटी गौरांगी हुई. बच्चे सभी पढ़ने में अच्छे थे. अपने और भाई दोनों के तीनों लड़कों को उसने इंजीनियरिंग कराया और तीनों बाहर प्राइवेट नौकरी करने लगे.
राजेंद्र गुप्ता और उसके भतीजों में कब से और कैसे हुआ मतभेद?
राजेंद्र गुप्ता का जो व्यवहार अपने भतीजों के साथ था, वो ऐसा था कि विक्की और जुगनू उसको देखना पसंद नही करते थे. उसकी एक वजह यह भी है राजेंद्र गुप्ता मां-बहन की गाली देकर उनसे बात करता था. गर्मी के दिनों में छोटी-छोटी गलतियों पर धूप में बांधकर मारता था. बर्थडे जैसी छोटी-छोटी खुशियों के लिए बच्चे तरस गए थे. यहां तक कि डॉली की शादी भी विक्की और जुगनू ने मिलकर की थी. लाखों रुपए महीने की आमदनी होने के बावजूद राजेंद्र ने एक रुपए की मदद नहीं की. समाज के दबाव में शादी में खड़ा जरूर रहा, लेकिन इसके अलावा दूसरी कोई मदद नहीं की.
संपत्ति से बेदखल करने की धौंस से भी दोनों भाई डरे हुए थे. अपनी दादी से भी वो इसका जिक्र करते थे, लेकिन दादी भी विवश ही थी. संपत्ति से बेदखल हो जाने का डर दोनों भाइयों में था और साल भर पहले हुई बहन डॉली की शादी में राजेंद्र गुप्ता द्वारा कोई मदद नहीं करना इस डर को और पुख्ता कर रहा था. राजेंद्र गुप्ता का खौफ उसके परिवार के साथ साथ 40 से ज्यादा किरायेदारों पर भी था. नाम न बताने की शर्त पर एक किरायेदार ने कहा कि राजेंद्र तुनक मिजाजी था. किसी से भी गाली से ही बात करता था. भतीजों को जन्मदिन तक मनाने की आजादी भी नहीं थी.
फिर आया 5 नवंबर 2024…
कोई भी कहानी शुरू चाहे कोई करे खत्म करना उसके हाथ में नही होता. राजेंद्र गुप्ता ने 5 नवंबर 1997 दिन मंगलवार को जो कहानी शुरू की थी, वो कहानी 5 नवंबर 2024 दिन मंगलवार को जाकर समाप्त हो गई. पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, मंगलवार को तड़के राजेंद्र गुप्ता को गोली मारी गई. पांच हत्याओं का सिलसिला रोहनिया थाना क्षेत्र के मीरापुर रामपुर गांव के निर्माणाधीन मकान में राजेंद्र की हत्या के साथ शुरू हुआ और फिर परिवार के चार अन्य सदस्यों को भेलूपुर थाना क्षेत्र के भदैनी इलाके में बने बहु मंजिला मकान में मार डाला गया. पुलिस इन पांच हत्याओं का मास्टरमाइंड विक्की को ही मान रही है. शारदा देवी ने भी विक्की पर ही शक जाहिर किया है.
पुलिस की पांच टीमें विक्की की तलाश में जुटी हुई हैं. पांच राज्यों में उसके लोकेशन के आधार पर गिरफ्तारी की कोशिशें चल रही हैं. राजेंद्र गुप्ता ने ये शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस दिन जिस तरीके से और जिस मकसद से उसने कहानी शुरू की थी, ठीक उसी दिन उसी तारीख और उसी तरीके से राजेंद्र गुप्ता की कहानी भी पूरी हो गई.
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